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Sunday, March 30, 2014

नफ़रत

अाँसुअों के भँवर में डूबी अ।ज

दिल ने ना जाने कितने सवाल कर डाले,

क्यों इस बेरहम दुनिया ने

मुझ पर इतने घाव कर डाले?

फिर दिल ने सोचा
क्यों ना अाज अपनी भडास निकालें?
नफरत जो दिल में है, उसे ज़ुबान पे ला डालें
क्यों ना अाज मातृभाषा में कुछ बोलें

नफरत है उन झूठी बातों से जो
वह लोग कभी ना सच कर पाए,
वो दिखाए हुए सपने,
शायद ही कभी सच हो पाए

वो झूठे वादें जो वह
कभी ना पूरे कर पाए,
अौर वे सब नकली अाँसू 
जो लोगो ने मेरे लिए झलकाए

नफरत है उन लोगों से मुझे
जिन्होने मुझे इस्तेमाल किय
अपने लक्ष्य तक जाने के लिये
मुझसे सीढी जैसा काम लिया।

दिल में अाता है कि 
क्यों ना उन लोगों से सीधे- सीधे बात करूं,
हर उन झठी बातों- वादों के लिए,
एक तमाचा मार सकूं

मेरी अन्तरात्मा को मारने के लिए
क्यों ना उन्हे सबक सिखा सकूं,
इस दिल के हज़ार टुकइे करने के लिए
क्यों ना एक पत्थर मै भी मार सकूं।

हर उस चोट के लिए 
क्यों ना मैं एक जवाब माँग सकूँ,
क्यों ना जो उन सबने मेरे साथ किया
मैं भी वैसा उनके साथ कर सकूँ

पर क्या मैं हो सकती हूँ उन सबों सी?
निर्मम, निर्दयी, हत्थारे सी?
चाह कर भी नहीं हो सकती उन सी मैं
नफरत चाहे जितनी हो, बुरा नहीं कर सकती मैं
पर शायद कभी माँफ भी नही कर सकती मैं।

लेकिन इतनी दुअा ज़रूर करती हूँ
कि कभी ज़िदगी के मोड पर 
तुम्हे अपनी गलती का अहसास तो हो
रो तुम फूट-फूट कर,
फिर भी कोइ तुम्हारे साथ ना हो

टूटे मन को दिलासा देने के लिए
कोई भी तुम्हारा खास ना हो,
तुम्हे सहारा देने के लिए 
कोई कँधा पास ना हो।

फिर उसी क्षण सोचती हूँ मैं
किसी को जीते जी मारने की
शायद यह सज़ा कम ना हो।

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