रुक गया है देश
ये मेरा, पर रुकी नहीं है
मेरी रेल,
इस लड़ाई से
जीतने को, बस थोड़ा थम गई
है रेल।
जज़्बा है अभी भी
क़ायम, इरादे हैं अभी भी
फ़ौलादी,
इस जंग को जीतने
को कमर कस ली है रेल।
फल, सब्ज़ी और दूध पहुँचाने
को, हाँ चल रही है
मेरी रेल,
कोई भी चूल्हा ना
बुझे, हर कोशिश कर रही
है रेल।
सूनसान ये स्टेशन
मेरा, कुछ तो बतलाता है,
जीतेंगे हम इस
जंग को, यही राज़ बताता
है।
यात्रियों की चहल
पहल, अब देखने को
नहीं मिलती है
वो सूनसान टिकट
खिड़की मेरी, ख़ुद से ये
बोलती है।
यूनफ़ॉर्म में
स्टेशन मास्टर, आज भी ड्यूटी पर
जाता है
इस लड़ाई में
जीतने को, रेल का साथ
निभाता है।
पटरी ठीक करने को
वो ट्रैकमैन, आज भी नहीं है
भूलता,
दौड़ेगी रेल फिर
से, ये उत्साह नहीं
है छूठता।
आज भी वो लोकों
पाइलट, घर से है निकलता
इस जंग को जीतने
के लिए, अपनी कर्मभूमि पर
है उतरता।
थमा हुआ सा मंडल
मेरा, रुकी सी जैसे हर
साँस है,
साथ मिलकर चलेंगे
हम फिर, सबको यही आस है।
ये ख़ामोश सी
पटरियाँ मेरी, देतीं हैं ये अमर
संदेश,
यह है ठहराव पल
भर का, फिर चल पड़ेगी
रेल ये मेरी,
फिर से दौड़ेगा
ये देश।
-स्वाती