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Thursday, December 28, 2017

दिनचर्या


इस रफ़्तार भरी ज़िंदगी में रुकने का नाम ही नहीं हम लेते,
अलार्म स्नूज़ करते करते ऑफ़िस के लिए हर रोज़ लेट ही हम निकलते।

ट्रैफ़िक को भेद, दौड़ते भागते ऑफ़िस पहुँचते,
लेट पहुचने पर भी आधे ऑफ़िस से पहले ही हम होते।

एस सर, जी सर करते-करते गर्दन है लचकाती,
कम्प्लाइयन्स, चेसिंग, टाप प्रायऑरिटी में सुबह से शाम हो जाती

6 बजते ही कब निकले हम इसी सोच में बैठ जाती,
ऑफ़िस से बाहर निकलते ही हल्की से मुस्कान वापस आ जाती

लम्बी ट्रेक से वापस आए हो ऐसा हम फ़ील करते,
पर अगली सुबह फिर जी सिर करने ऑफ़िस पहुँचा करते।

इस भागती-दौड़ती ज़िंदगी में weekend का ही सहारा है,
थोड़ी देर के लिए ही बस थमे ज़िंदगी यही लक्ष्य हमारा है।

लाइफ़ की तब लगती है जब सर कहते है कल सैटर्डे भी ऑफ़िस आना है,
ना जिएँगे, ना जीने देंगे रेल का यही नारा है।

सोचा था अफ़सर बनकर मौज करेंगे, अफ़सर होता राजा है,
सर पर पड़ी तो समझ आया ये सब एक छलावा है।

फिर सोचती हूँ कि प्राइवट नौकरी ही क्यूँ ना करती
जब इतना काम ही करना था तो सरकारी नौकरी कहाँ पचती।

कौन कहता है सरकारी नौकरी में सुकून है?
यहाँ तो दिन रात काम का ही जुनून है।

रेल की नौकरी भी रेल की तरह ही चलेगी,
कभी लेट, कभी आन- टाइम लगता है इसी तरह ज़िंदगी कटेगी।