इस रफ़्तार भरी ज़िंदगी में रुकने का नाम ही नहीं हम लेते,
अलार्म स्नूज़ करते करते ऑफ़िस के लिए हर रोज़ लेट ही हम निकलते।
ट्रैफ़िक को भेद, दौड़ते भागते ऑफ़िस पहुँचते,
लेट पहुचने पर भी आधे ऑफ़िस से पहले ही हम होते।
कम्प्लाइयन्स, चेसिंग, टाप प्रायऑरिटी में सुबह से शाम हो जाती
ऑफ़िस से बाहर निकलते ही हल्की से मुस्कान वापस आ जाती
पर अगली सुबह फिर जी सिर करने ऑफ़िस पहुँचा करते।
थोड़ी देर के लिए ही बस थमे ज़िंदगी यही लक्ष्य हमारा है।
ना जिएँगे, ना जीने देंगे रेल का यही नारा है।
सर पर पड़ी तो समझ आया ये सब एक छलावा है।
जब इतना काम ही करना था तो सरकारी नौकरी कहाँ पचती।
यहाँ तो दिन रात काम का ही जुनून है।
कभी लेट, कभी आन- टाइम लगता है इसी तरह ज़िंदगी कटेगी।