रंग-रंगी गाड़ियों को , मेन गेट से बाहर-अंदर आते देखती हूँ,
बाल लहराती लड़कियों को omaxe की गलियों में टहलते देखती हूँ,
हाथ में टिफ़िन लिए, टाई पहने लड़कों को ऑफिस जाते हुए देखती हूँ.
कभी- कभी मेरा मन भी इन्ही के साथ वॉक को नकल लेता है,
बाल बिखराए स्टाइल में , मेरा मन भी पार्क का एक राउंड लगा ही लेता है.
यूँ मस्त मगन टहलते हुए जब मन अपने फ्लैट के सामने वापस पहुँचता है,
तब सपना कहीं लुफ्त होकर सच्चाई का नकाब ले लेता है,
अंदर से आवाज़ आती है, एक महीना बचा है, सुधर जा बेटा, सपना सपना रह जाएगा संभल जा बेटा.
मन भी कुंठित हो, किताब हाथ में ले ही लेता है,
कैदी नंबर २०१, फिर अपने सपनों का कैदी बन ही लेता है.
अगर UPSC ना होता, तो ज़िन्दगी कैसी होती?
मौज मस्ती, हंसती खेलती,एक लम्बी हॉलिडे होती!
स्कर्ट-टॉप पहने टहलते हम भी हज़रतगंज,
थोड़ा भौकाल मचाने चले जाते कार्यालय भी हम.
हाँ, तब होली दीवाली भी खूब मनती,
प्रीलिम्स और मेंस की टेंशन कहाँ होती!
सुबह तब उठते जब होता अपना मन,
हंसती खेलती ज़िन्दगी में ना होता कोई इंटरवेंशन!
पर मगर ये UPSC के सिवा भी क्या ज़िन्दगी होती,
बिना स्ट्रगल के भी क्या लाइफ ब्यूटीफुल होती?
UPSC की जंग में मर के ही तो ज़िन्दगी को जिया है,
पढाई के बीच छोटे ब्रेक में ही तो लाइफ का लुत्फ़ लिया है.
UPSC ने ही तो बनाया है जीवन सार्थक,
नहीं तो ता उम्र बीत जाती, कभी मॉल तो कभी पार्लर.
इस चार दीवारी में ही तो पाई है मैंने अपनी आज़ादी,
ख़्वाबों की उड़ान को कहाँ रोक पाई है कोई सल्लाखें या बाउंड्री
इस UPSC की लड़ाई में एक बार फिर मर जाने का मन करता है,
वरना फ्रीडम के इस दौर में शहीद होने का मौका कहाँ मिलता है!
